शनिवार, 28 नवंबर 2015

ग्रामीण खेती मजदूरो की दशा।


कृषी प्रधान देश भारत मे किसान को ही अन्नदाता माना जाता है । एवं श्रम का सारा श्रेय किसान को ही दिया जाता है । जवकि आज वह जमाने नही रहे तव किसान खुद  अपने खेतो मे हल चलाते थे । कवि उन पर लिखते थे कि _ सूरज के उगने से पहले खाट छोड  उठ गया किसान ' और चला खेत पर करने काम - - -  ।
आज तो कृषी कार्य मशीन यंत्रों से होता है । बाकी का सारा कृषी काम मजदूर करते है । किसान तो जमीन का मालिक होता है और प्रबंधन करता है । जबकि खेती मजदूर ठंड ' गरमी ' धूप ' बरसात  मे भी खेतो मे काम करते है । रात मे भी खेतो की रखवाली वा पानी सिचाई जेसे काम भी करते है । खेतो मे जहरीली दवाओं का छिडकाव  और धान की फसल मे सुगंध के कारण सॉपो के होने पर भी यह मजदूर  अपनी जान की परवाह किए बिना खेतो मे खतरा होने पर भी काम करते है । क्योकि इनहे अपना परिवार  चलाना होता है । पर  इन पर किसी की नजर नही जाती  न कवि  न पत्रकार न सरकार  कोई इनहे नही देखते ' सिवाय  एक चमगीदण के जो इनके अंधेरे झोपडो मे भी देख लेता है ।

मध्य भारत के गॉवो मे रहने वाले भूमी हीन लोगो के पास  आय का साधन न होने के कारण यह लोग खेती मजदूरी पर ही   निर्भर रहते है । पर हर बडा जानवर छोट को खाता है ' इस नियम के तहत किसान  इन मजदूरो का शोषण करके अपना धर्म निभाते है । बर्तमान समय मे गॉवो मे कृषी कामगारो से दिन मे 10 घंटे काम लिया जाता है । और  एक दिन की मजदूरी का रेट 150 रू से200 तक देय है । भुगतान  अनाज बिकने पर किया जाता है '  एवं जव  अनाज का अच्छा भाव होता है तब  अनाज बैचा जाता है । और फिर मजदूरो का भुगतान होता है ।
एसी स्थति मे बेचारा  कृषी मजदूर कैसे जीता होगा । सरकार के पास  इसका जवाव है ' नरेगा '  पर नरेगा मॉ  टी वी और कगजो मे ही दिखती है । नरेगा का सारा काम मशीनो से होता है । बैक से पैसा किराए के मजदूरो दुवारा निकलवा लिया जाता है ।
अब ग्रामीण मजदूर के पास  एक ही रास्ता होता है की वह शहर मे जाकर काम करे ' पर इनमे से कुछ लोग  अपनी जन्म भूमी नही छोडना चाहते । अब  इनके पास  आखरी बिकल्प होता है कि यह मजदूर बैक से रिण लेकर  अपना स्वरोजगार करे । पर  इस  अस्त्र का प्रयोग  इनके बापो ने पहले ही कर लिया ' और  अभी चुकाया नही गया ' इस कारण बैक रिण नही देता । कृषि कामगारों के लिए विशेष  कर  सरकार की भी कोई एसी योजना नही है जिसके चलते इन कामगारो का विकाश हो सके ' अरे हॉ याद  आया  एक योजना है सरकार की  २ रू किलो अनाज मिलने बाली योजना ' जिसके सहारे यह लोग जीवित रह सकते है । क्योकि अगर यह लोग नही रहेगे तो कृषि काम के अलावा भवन पुल बॉध बनाने का काम कोन करेग ।  फिर तो ईट मिट्टी गारे का काम भी इंजीनियर  को ही करना पडेगा । पर  एसी नोवत नही आएगी क्योकि  इन मजदूरो के बच्चे है ना जो  भविश्य मे मजदूरी करने के लिए तैयार हो रहै है ' सरकारी स्कूलो मे पढ कर  ' गॉव के सरकारी स्कूलो मे मजदूरो के ही बच्चे जादा पढते है । वहॉ इन बच्चो को ज्ञान के नाम पर मध्यान भोजन के रूप मे अल्प  अहार ही मिलता है ।
इन गॉव के गरीब लोगो के बारे  मे जानकारी मिलती है कि  इनमे से अधिकाश  के बाप दादा परदादा भी हलवाहे या खेतीहल मजदूर का ही काम करते थे । और  अब  इनके बच्चे भी आगे मजदूरी ही करेगे । इनकी किसमत मे मजदूरी करना ही लिखा है । यह  इनका दुरभाग्य है ।
चमगीदण की नजर मे इनका आर्थिक विकास असंभव ही नही नामुमकिन है ।

Seetamni@gmail. com
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