शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

गडे धन की पहचान ।

राह किनारे चोराहो तिराहो पर स्थापित देवो के पीछे क्या उद्देश्य होगा । यह मूर्ती पूजा के बिरोध की बात नही है । देवी देवताओं की स्थापना प्रण प्रतिस्ठा के साथ होती है ' जिसमे बृहम्ण मंत्र  उच्चारण के साथ हवन विधि संपन्न करते है । इसके बाद ही देवी देवता पूजा योग्य माने जाते है । पर रास्तो के किनारे स्थापित इन साधारण पत्थरो की प्रण प्रतिस्ठा किसने की होगी । न तो यह कलॉ कृतियॉ है और न  इनके नाम देवी देवताओ से मेल खाते है । तो फिर इनहे पूजना कहॉ तक सही होगा ।
इन देव स्थानो की स्थापना के बारे मे पुराने लोग बताते है कि पुराने जमाने मे चॉदी की मुद्राए चलती थी ।और  उस समय बंजारे व्यापारी व्यापार करते थे । व्यापार के दोरान जब  इन बंजारो के पास  अधिक धन  इकट्ठा हो जाता था तब  उनहे इतना सारा धन साथ लेकर चलने मे कठिनाई होती थी । क्योंकि इसमे बजन भी होता था और इसके रखरखाव मे सिक्के खनकते भी थे जिससे लुटने का डर भी होता था । इसलिए यह बंजारे इस धन को रास्ते के किनारे किसी पेड़ के नीचे जमीन मे गाड कर रख देते थे और  उस स्थान के ऊपर पहचान के लिए पत्थर रख देते थे । यह  उनकी तरकीव होती थी । दूसरे राहगीर  इस पत्थर को देवता समझते थे जिससे बजारो का धन सुरक्षित रहता था । जब कभी बंजारो को इस धन की जरूरत होती थी तव वे उचित समय देखकर  इस धन को निकाल कर ले जाते थे ।
एसे ही कुछ स्थानो का धन बंजारे व्यापारी किन्हीं कारणो से नही निकाल पाए 'और व धन जमीन मे ही दवा रहगया ।  जो आज भी है । एसे किसी किसी देव स्थानो के निचे से पुराने गडे धन मिलने की खवरे भी कभी कभी मिलतीं है । इन पुरानी राहो और पकडंडी के पास के पुराने देव स्थानो के पक्के चबूतरे बनाने के लिए खोदी जाने वाली नीव 'प्लर  आदि के गडढो मे पुराने मिट्टी के खाली घडे आदि मिलते है । जो इस बात का संकेत देते है की यह स्थान कभी धन गाडकर रखने के स्थान थे । स्थान की पहचान  एवं धन की रक्षा के लिए इन स्थानो को देव स्थानो का रूप दिया गया होगा ।और यह मान्यताए समय के साथ  और मजबूत होती गई ।
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